छतरपुर
केन-बेतवा मुआवज़ा: हड्डी की जाँच से तय हो रही उम्र, 7,193 परिवार डूब क्षेत्र में
जिन आदिवासी परिवारों के पास जन्म का कोई काग़ज़ नहीं है, उनकी उम्र अब अस्पताल में एक्स-रे और हड्डी की जाँच से तय की जा रही है — तभी केन-बेतवा परियोजना का मुआवज़ा मिलेगा। छतरपुर में अब तक क़रीब 180 लोगों की जाँच हो चुकी है। यही परियोजना महोबा, झाँसी, ललितपुर और बाँदा के खेतों तक पानी पहुँचाने वाली है।
बुंदेलखंड खबर डेस्क • छतरपुर •
मुख्य बातें
- जन्म प्रमाणपत्र न होने पर उम्र अब बोन डेंसिटी टेस्ट और एक्स-रे से तय — छतरपुर ज़िला अस्पताल में अब तक लगभग 180 जाँचें।
- मुआवज़ा पाने के लिए कट-ऑफ़ तारीख़ पर कम से कम 18 साल का होना ज़रूरी; ज़मीन की श्रेणी के हिसाब से तारीख़ अलग-अलग।
- छतरपुर और पन्ना के 22 गाँवों के 7,193 परिवार डूब क्षेत्र में; आंदोलनकारी परिवार नहीं, हर बालिग़ के लिए अलग ₹12.5 लाख के पैकेज की माँग कर रहे हैं।
- परियोजना की कुल लागत ₹44,605 करोड़; दौधन बाँध 77 मीटर ऊँचा, लिंक नहर 221 किलोमीटर।
- सिंचाई 10.62 लाख हेक्टेयर — मध्य प्रदेश में 8.11 लाख और उत्तर प्रदेश में 2.51 लाख हेक्टेयर, जिसमें महोबा, झाँसी, ललितपुर और बाँदा शामिल।
छतरपुर। केन-बेतवा लिंक परियोजना के डूब क्षेत्र में आने वाले जिन आदिवासी परिवारों के पास जन्म का कोई काग़ज़ नहीं है, उनकी उम्र अब ज़िला अस्पताल में हड्डी की जाँच (बोन डेंसिटी टेस्ट) और एक्स-रे से तय की जा रही है। वजह यह है कि मुआवज़ा उसी को मिलेगा जो तय कट-ऑफ़ तारीख़ पर कम से कम 18 साल का रहा हो — और यह साबित करने के लिए काग़ज़ चाहिए, जो बहुत से परिवारों के पास कभी था ही नहीं।
छतरपुर ज़िला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी नमः शिवाय अर्जरिया के मुताबिक़, "पुनर्वास से गुज़र रहे जिन ग्रामीणों के पास उम्र से जुड़ा कोई दस्तावेज़ नहीं है, उनकी उम्र तय करने के लिए कलेक्टर के निर्देश पर ज़िला अस्पताल में बोन डेंसिटी टेस्ट कराए जा रहे हैं।" अब तक लगभग 180 लोगों की ऐसी जाँच हो चुकी है।
यह छोटी-सी ख़बर असल में एक बड़ी बात कहती है। जिन घरों में स्कूल का रिकॉर्ड नहीं, जन्म का पंजीकरण नहीं, उन्हीं घरों से अब यह साबित करवाया जा रहा है कि वे मुआवज़े के हक़दार हैं — अपनी ही ज़मीन छोड़ने के बदले।
## कितने लोग, कितनी ज़मीन
दौधन बाँध बनने से छतरपुर और पन्ना ज़िलों के 22 गाँवों के 7,193 परिवार विस्थापित होंगे। इनमें बड़ी संख्या अनुसूचित जनजाति के परिवारों की है, जिनकी रोज़ी-रोटी जंगल से जुड़ी है।
सरकार की ओर से पुनर्वास पैकेज तय है, पर आंदोलन कर रहे परिवारों की माँग अलग है — वे चाहते हैं कि मुआवज़ा परिवार के हिसाब से नहीं, हर बालिग़ सदस्य के हिसाब से ₹12.5 लाख दिया जाए। तर्क यह है कि एक घर में तीन-चार बालिग़ भाई अलग-अलग परिवार चलाते हैं, और एक ही पैकेट में सबका हिस्सा नहीं आ सकता।
## आंदोलन कहाँ तक पहुँचा
विरोध 2023 से चल रहा है, पर देश का ध्यान अप्रैल 2026 में गया, जब आदिवासी महिलाओं ने परियोजना स्थल के पास "चिता आंदोलन" किया — प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटकर। नारा था: "न्याय दो या मार दो।"
जुलाई 2026 में फिर जल सत्याग्रह और भूख हड़ताल हुई। दो हफ़्ते से ज़्यादा चले धरने के बाद 19 जुलाई 2026 को पुलिस ने कूपी गाँव के पास धरना स्थल ख़ाली करा दिया। अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे कार्यकर्ता अमित भटनागर को वहाँ से हटाया गया। आंदोलनकारियों का कहना है कि उनकी मूल माँगें अब भी जहाँ की तहाँ हैं।
## परियोजना है क्या
केन-बेतवा लिंक देश की नदी जोड़ो योजना की पहली बड़ी परियोजना है। सोच 1980 की राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना से आई, 2005 में केंद्र, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ, और दिसंबर 2021 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹44,605 करोड़ की लागत मंज़ूर की। दिसंबर 2024 में आधारशिला रखी गई और सितंबर 2025 से निर्माण चल रहा है।
ढाँचा इस तरह है:
- दौधन बाँध — केन नदी पर, 77 मीटर ऊँचा, पन्ना टाइगर रिज़र्व के भीतर
- लिंक नहर — 221 किलोमीटर लंबी, जिसमें सुरंगें भी शामिल
- लोअर ओर बाँध, बीना कॉम्प्लेक्स और कोठा बैराज — दूसरे चरण में
पूरा होने का अनुमानित समय 2030 है।
## बुंदेलखंड को इससे क्या मिलेगा
यह हिस्सा हमारे पाठकों के लिए सबसे ज़रूरी है। परियोजना से कुल 10.62 लाख हेक्टेयर ज़मीन को सिंचाई मिलनी है:
- मध्य प्रदेश में 8.11 लाख हेक्टेयर — पन्ना, दमोह, छतरपुर, टीकमगढ़, निवाड़ी, सागर, रायसेन, विदिशा, शिवपुरी और दतिया
- उत्तर प्रदेश में 2.51 लाख हेक्टेयर — महोबा, झाँसी, ललितपुर और बाँदा
यानी जिन ज़िलों की खबरें हम रोज़ छापते हैं, उनमें से कई सीधे इस परियोजना के लाभ क्षेत्र में हैं। इसके अलावा क़रीब 62 लाख लोगों को पीने का पानी और 103 मेगावाट बिजली मिलने का दावा है।
बुंदेलखंड में पानी कोई मामूली मुद्दा नहीं। यहाँ सूखा बार-बार पड़ता है, और हर सूखे के बाद गाँव से पलायन की एक और लहर चलती है। इसलिए इस परियोजना के पक्ष में सबसे मज़बूत तर्क यही है।
## क़ीमत किसकी
दूसरा पक्ष भी उतना ही असली है, और वह भी बुंदेलखंड का ही है।
पन्ना टाइगर रिज़र्व की लगभग 6,017 हेक्टेयर ज़मीन डूब क्षेत्र में आ रही है। 2021 में *करंट साइंस* में छपे एक अध्ययन के मुताबिक़ परियोजना रिज़र्व के महत्वपूर्ण बाघ-क्षेत्र का लगभग 10% (क़रीब 58 वर्ग किलोमीटर) सीधे डुबो देगी, और आवास के टुकड़े-टुकड़े होने से 105 वर्ग किलोमीटर से ज़्यादा का अप्रत्यक्ष नुक़सान होगा।
पन्ना बुंदेलखंड का सबसे घना जंगल है और वही जगह है जहाँ बाघ ख़त्म हो जाने के बाद दोबारा बसाए गए थे — देश की सबसे सफल मानी जाने वाली कोशिशों में से एक। घड़ियाल और गिद्धों की कई लुप्तप्राय प्रजातियाँ भी इसी इलाक़े में हैं।
## जो सवाल अब भी खुले हैं
जानकारों ने कुछ सवाल बार-बार उठाए हैं, जिनका साफ़ जवाब अब तक सार्वजनिक नहीं है:
1. केन में सचमुच "फ़ालतू" पानी है या नहीं — पूरी परियोजना इसी मान्यता पर खड़ी है कि केन के पास देने लायक़ अतिरिक्त पानी है। गर्मियों में केन का जलस्तर बहुत गिरता है, और यह आकलन जिन आँकड़ों पर टिका है वे सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।
2. मुआवज़ा ज़मीन पर पहुँचा या नहीं — काग़ज़ों में पैकेज तय है, पर देरी और अधूरे भुगतान की शिकायतें लगातार आ रही हैं। हड्डी की जाँच वाली यही ख़बर इसका सबूत है कि प्रक्रिया अब भी उलझी हुई है।
3. छोटे विकल्प क्यों नहीं — कई विशेषज्ञ तालाब सुधार, छोटी नहरें, सूक्ष्म सिंचाई और पुरानी जल-संचय व्यवस्थाओं को लौटाने जैसे कम ख़र्चीले रास्ते सुझाते रहे हैं।
## बुंदेलखंड खबर की बात
यह ख़बर हमारे इलाक़े को दो हिस्सों में बाँटती है। पन्ना और छतरपुर घर और जंगल दे रहे हैं; महोबा, झाँसी, ललितपुर और बाँदा को पानी मिलना है। दोनों तरफ़ बुंदेलखंड के ही लोग हैं।
इसलिए हम न इसे सिर्फ़ "विकास" कहकर छोड़ेंगे, न सिर्फ़ "विनाश" कहकर। हम इस पर नज़र रखेंगे — ख़ासकर इस बात पर कि मुआवज़ा वाक़ई कितने परिवारों तक पहुँचा, और वादे का पानी कब और किस गाँव तक पहुँचा।
अगर आप डूब क्षेत्र के किसी गाँव से हैं, या आपके यहाँ नहर का काम चल रहा है, तो हमें बताइए। यह ख़बर आगे आपके ही ब्योरे से बनेगी।
संपादक: प्रकाश सक्सेना • बुंदेलखंड खबर