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नवंबर से फरवरी तक मंडराएगा ‘सुपर अल-नीनो’: 180 वैज्ञानिकों की चेतावनी, भीषण गर्मी-सूखे की आशंका
भारत में ‘सुपर अल-नीनो’ की आहट: 180 से अधिक वैज्ञानिकों ने जताई गंभीर चिंता, असर रहने वाला है कई महीनों तक
प्रकाश सक्सेना • सभी ज़िले •
मुख्य बातें
- समय-सीमा: ‘सुपर अल-नीनो’ नवंबर 2026 से फरवरी 2027 तक बना रहने की संभावना, असर 2027 की शुरुआती तिमाही तक महसूस किया जा सकता है।
- मुख्य जोखिम: भीषण गर्मी, लंबा सूखा, अनियमित बारिश, जंगल की आग, समुद्री तापमान वृद्धि और कोरल ब्लीचिंग का खतरा।
- तैयारी का आह्वान: वैज्ञानिकों ने मॉनिटरिंग मजबूत करने, कृषि-जल-वन विभागों में समन्वय बढ़ाने और जोखिम वाले क्षेत्रों में पूर्व-तैयारी शुरू करने की सलाह दी है।
नई दिल्ली। देश के 180 से अधिक पर्यावरण वैज्ञानिकों और इकोलॉजिस्ट ने आगामी ‘सुपर अल-नीनो’ को लेकर रेड अलर्ट जारी किया है। इनका कहना है कि नवंबर 2026 से शुरू होकर फरवरी 2027 तक चलने वाले इस अत्यंत शक्तिशाली अल-नीनो का असर भारत में भीषण गर्मी, कम बारिश, सूखे, जंगल की आग और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर रूप से दिख सकता है।
वैज्ञानिकों की चेतावनी का मूल मसौदा
देश के 180 से अधिक वैज्ञानिकों और पारिस्थितिकी विशेषज्ञों ने एक संयुक्त अपील पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें साथी शोधकर्ताओं, सरकारी एजेंसियों और फंडिंग संस्थानों से ‘सुपर अल-नीनो’ के लिए तुरंत तैयारी करने की गुहार लगाई गई है। अपील में कहा गया है कि इस स्तर के अल-नीनो से भारत की प्राकृतिक प्रणालियों—जंगल, समुद्र, नदियाँ, कृषि और पशुपालन—पर अभूतपूर्व दबाव पड़ सकता है, इसलिए निगरानी और रिकॉर्ड-कीपिंग को तुरंत मजबूत किया जाए। वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से इकोलॉजिस्ट और फील्ड वर्कर्स से आह्वान किया है कि वे चरम मौसमी घटनाओं के प्रभावों को समझने के लिए रिसर्च और मॉनिटरिंग का दायरा बढ़ाएं।
‘सुपर अल-नीनो’ क्या है और कब तक रहेगा असर?
अल-नीनो की पहचान उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने से होती है; जब यह तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाए तो इसे ‘सुपर’ या ‘वेरी स्ट्रॉन्ग’ अल-नीनो कहा जाता है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने पहले ही संकेत दिया है कि 2026 में अब तक का सबसे शक्तिशाली अल-नीनो आ सकता है, जो नवंबर 2026 से लेकर फरवरी 2027 तक बना रहने की संभावना है। भारतीय मौसम विभाग और अन्य विशेषज्ञों के अनुसार, इसका प्रभाव न केवल मानसून के बाद की सर्दियों में, बल्कि 2027 की शुरुआती तिमाही तक भी महसूस किया जा सकता है, खासकर तापमान, बारिश के पैटर्न और समुद्री लहरों में।
भारत पर संभावित असर: गर्मी, सूखा और पारिस्थितिकी संकट
वैज्ञानिकों ने जो मुख्य जोखिम रेखांकित किए हैं, उनमें शामिल हैं:
- भीषण गर्मी और सूखा: लंबे सूखे और अत्यधिक गर्मी के कारण किसानों, मछुआरों और पशुपालकों पर भारी दबाव पड़ सकता है; सिंचाई और पेयजल संकट गहरा सकता है।
- कम और अनियमित बारिश: मानसून के वापसी के बाद भी देर से आने वाली बारिश कम और छिटपुट हो सकती है, जिससे मध्य और दक्षिण भारत में देर से मानसून कमजोर रह सकता है।
- जंगल की आग और पारिस्थितिकी क्षति: सूखे और गर्मी के चलते जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ सकती हैं; बड़े वर्षावन के पेड़ों की मौत और वन्यजीवों पर दबाव की आशंका जताई गई है।
- समुद्री तापमान और कोरल ब्लीचिंग: समुद्र में मरीन हीटवेव्स बढ़ने से कोरल रीफ्स में ब्लीचिंग और मृत्यु दर बढ़ सकती है, जिससे मछली पकड़ने वाले समुदाय प्रभावित होंगे।
- चरम बारिश और बाढ़ का विरोधाभास: हालांकि कुल बारिश कम रहने की संभावना है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में अचानक भारी बारिश से बाढ़ और भूस्खलन का खतरा भी बना रहेगा।
मौजूदा मानसून आंकड़े और पृष्ठभूमि
इस साल 4 जून से 19 सितंबर के बीच भारत में औसतन 15% कम बारिश दर्ज की गई; दक्षिणी प्रायद्वीप में यह कमी 29% तक रही। केरल जैसे राज्यों में कुल मानसून बारिश औसत से कम होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर भारी बारिश से बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं हुईं, जो अल-नीनो के दौरान ‘कम बारिश लेकिन ज्यादा चरम वर्षा’ वाले पैटर्न को दर्शाती हैं। जुलाई–अगस्त 2026 में अल-नीनो के प्रभाव से मानसून में कमी देखी गई; अब देर मानसून में यदि सकारात्मक IOD (Indian Ocean Dipole) मजबूत नहीं हुआ तो सूखे के लंबे अंतराल और कमजोर मानसून समाप्ति की आशंका बनी हुई है।
सरकार और शोध समुदाय से क्या अपेक्षा है?
वैज्ञानिकों ने तुरंत मॉनिटरिंग नेटवर्क को मजबूत करने, इकोसिस्टम में बदलावों का दस्तावेजीकरण करने और जोखिम वाले क्षेत्रों में पूर्व-तैयारी योजनाएं बनाने की सलाह दी है। कृषि, जल संसाधन, वन और आपदा प्रबंधन विभागों से समन्वय बढ़ाने, किसानों और स्थानीय समुदायों को समय पर चेतावनी और सलाह देने की गुजारिश की गई है। फंडिंग एजेंसियों से अल-नीनो प्रभाव अध्ययन, इकोलॉजिकल रिसर्च और क्लाइमेट एडाप्टेशन प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता देने का आह्वान किया गया है।
निष्कर्ष: तैयारी ही एकमात्र रास्ता
वैज्ञानिक स्पष्ट करते हैं कि यह कोई सामान्य अल-नीनो नहीं, बल्कि ‘सुपर’ स्तर की घटना हो सकती है, जिसका असर कई महीनों तक रहेगा। इसलिए, सरकारी तंत्र, शोध संस्थान और स्थानीय प्रशासन को मिलकर जल संकट, कृषि उत्पादन, वन सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पूर्व-तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।
संपादक: प्रकाश सक्सेना • बुंदेलखंड खबर