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पन्ना में 11वें दिन उग्र हुआ ‘चिता आंदोलन’, पानी में उतरे सैकड़ों ग्रामीण

मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में मझगाय-रुंझ और केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित लोगों का जल सत्याग्रह शुरू हो गया है। मुआवजे और पुनर्वास की मांग को लेकर ग्रामीण पानी में उतरकर विरोध जता रहे हैं।

बुंदेलखंड खबर डेस्क • पन्ना •

पन्ना में 11वें दिन उग्र हुआ ‘चिता आंदोलन’, पानी में उतरे सैकड़ों ग्रामीण

मुख्य बातें

  • मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में मझगाय-रुंझ और केन-बेतवा परियोजना के खिलाफ चिता आंदोलन 11वें दिन और उग्र हो गया।
  • जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर की अगुवाई में सैकड़ों ग्रामीण पानी में उतरकर जल सत्याग्रह कर रहे हैं।
  • आंदोलनकारियों का आरोप है कि सिंचित जमीन को असिंचित दर्ज किया गया है जिससे मुआवजे पर असर पड़ा है।

मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में मझगाय-रुंझ मध्यम सिंचाई परियोजना और केन-बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित किसानों और आदिवासी परिवारों का आंदोलन लगातार तेज हो रहा है। मुआवजे, पुनर्वास और प्रभावित परिवारों के अधिकारों की मांग को लेकर चल रहा ‘चिता आंदोलन’ 23 Sep 2026 को 11वें दिन और अधिक उग्र हो गया। इस दौरान सैकड़ों महिला और पुरुष ग्रामीण पानी में उतरकर जल सत्याग्रह करते नजर आए। प्रदर्शनकारियों ने पानी में खड़े होकर प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की और अपने शरीर पर मिट्टी लगाकर विरोध जताया।

मझगाय बांध में जलस्तर बढ़ने के बीच शुरू हुआ यह आंदोलन अब कई परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों का साझा रूप ले चुका है। आंदोलन की शुरुआत प्रभावित परिवारों ने प्रतीकात्मक चिता बनाकर की थी, जिसके बाद मिट्टी सत्याग्रह, सांकेतिक फांसी और अब जल सत्याग्रह के जरिए विरोध दर्ज कराया जा रहा है। जय किसान संगठन के नेता और आंदोलन की अगुवाई कर रहे अमित भटनागर ने बताया कि लोगों के घर और खेत डूबने की कगार पर हैं लेकिन समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हुआ है। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया है कि कई किसानों की उपजाऊ और सिंचित जमीन को सरकारी रिकॉर्ड में असिंचित दर्ज किया गया है, जिससे मुआवजे की राशि पर असर पड़ा है।

इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में बड़ी विकास परियोजनाओं से जुड़ा विस्थापन और पर्यावरण का सवाल मुख्य रूप से शामिल है। केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर बुंदेलखंड में लंबे समय से विस्थापन और पुनर्वास से जुड़े सवाल उठते रहे हैं। 21 सितंबर को प्रभावितों ने जल सत्याग्रह के बाद मिट्टी सत्याग्रह के जरिए आंदोलन तेज किया था, और 22 सितंबर को कुछ विस्थापितों को मुआवजा संबंधी प्रमाण पत्र वितरित किए जाने की खबरें भी सामने आई थीं। इसके बावजूद ग्रामीणों का कहना है कि कई परिवार अब भी अपने अधिकारों से वंचित हैं।

इस आंदोलन का सीधा असर ग्रामीण इलाकों के किसानों और आदिवासी परिवारों पर पड़ रहा है जिनकी आजीविका, घर और खेती खतरे में है। ग्रामीणों का कहना है कि विकास परियोजनाओं का लाभ भले ही व्यापक क्षेत्र को मिले, लेकिन उसकी कीमत केवल उन परिवारों से नहीं वसूली जानी चाहिए जिनकी जमीन और घर लिए जा रहे हैं। गलत रिकॉर्ड और कम मुआवजे के कारण किसानों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उनके भविष्य की सुरक्षा पर संकट गहरा गया है।

आगे की प्रक्रिया के तहत आंदोलनकारियों ने साफ कर दिया है कि जब तक सभी पात्र विस्थापितों को उचित मुआवजा, जमीन का सही मूल्यांकन और सम्मानजनक पुनर्वास नहीं मिलता, तब तक उनका सत्याग्रह जारी रहेगा। प्रभावित परिवारों का यह भी कहना है कि उन्हें केवल कागजों पर पुनर्वास नहीं चाहिए, बल्कि ऐसा न्यायपूर्ण और पर्याप्त मुआवजा चाहिए जिससे वे अपने परिवार के साथ सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें।

संपादक: प्रकाश सक्सेना • बुंदेलखंड खबर