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मूसलाधार बारिश में भी लठाटोर महाराज का जलविहार: झाँसी के मऊरानीपुर में सैकड़ों देव विमानों ने किया नगर भ्रमण

झाँसी के मऊरानीपुर में मूसलाधार बारिश के बावजूद श्रद्धालुओं ने आस्था के साथ भगवान लठाटोर महाराज का जलविहार मनाया। सैकड़ों देव विमानों ने नगर भ्रमण कर सुखनई नदी में जलविहार किया।

बुंदेलखंड खबर डेस्क • झाँसी •

मूसलाधार बारिश में भी लठाटोर महाराज का जलविहार: झाँसी के मऊरानीपुर में सैकड़ों देव विमानों ने किया नगर भ्रमण

मुख्य बातें

  • झाँसी के मऊरानीपुर में 24 से 25 घंटे की लगातार बारिश के बीच हुआ जलविहार।
  • भगवान लठाटोर महाराज की अगुवाई में सैकड़ों देव विमानों ने सुखनई नदी में किया जलविहार।
  • अंग्रेजी शासनकाल में भी रोकने की कोशिश के बावजूद यह सदियों पुरानी परंपरा निर्बाध रूप से जारी रही।
  • बारिश के कारण मेले के दुकानदारों का कारोबार प्रभावित हुआ, लेकिन भक्तों की आस्था पर असर नहीं पड़ा।

झाँसी के मऊरानीपुर में 24 से 25 घंटे की लगातार मूसलाधार बारिश के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था में कोई कमी नहीं आई। भगवान लठाटोर महाराज की अगुवाई में सैकड़ों देव विमानों ने नगर भ्रमण किया और सुखनई नदी में जलविहार संपन्न किया। ढोल-नगाड़ों और डीजे की धुन पर निकली इस धार्मिक यात्रा को देखने के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय लोग मौजूद रहे।

इस आयोजन के दौरान पुलिस सुरक्षा के बीच गाजे-बाजे के साथ भगवान का विहार पूरा किया गया। स्थानीय मान्यता के अनुसार, भगवान लठाटोर महाराज को पहले लाठियों से विहार के लिए ले जाया जाता था और वे उन लाठियों को तोड़ देते थे, जिस कारण उनका नाम लठाटोर पड़ा। इस यात्रा में गूदर बाबा की महिमा को भी याद किया गया, और बारिश के कारण मेले के दुकानदारों के कारोबार पर असर जरूर पड़ा, लेकिन भक्तों के उत्साह में कोई कमी नहीं आई।

यह जलविहार महोत्सव कई सदियों पुरानी परंपरा है, जो आज भी पूरी निष्ठा के साथ निभाई जाती है। इतिहास में अंग्रेजी शासनकाल के दौरान भी इस यात्रा को रोकने के कई प्रयास किए गए थे, लेकिन स्थानीय लोगों और भक्तों के सामूहिक प्रयासों के कारण यह परंपरा कभी रुकी नहीं और हमेशा निर्बाध रूप से आगे बढ़ती रही।

इस आयोजन का सीधा असर स्थानीय कारोबारियों और दुकानदारों पर देखा गया, क्योंकि लगातार बारिश के कारण मेले की बिक्री और व्यापारिक गतिविधियों पर फर्क पड़ा। हालांकि, आम श्रद्धालुओं, किसानों और युवाओं के लिए यह पर्व उनकी सांस्कृतिक आस्था और परंपराओं से जुड़े रहने का एक बड़ा अवसर बना रहा, जहाँ मौसम की बाधाएं भी उनकी श्रद्धा को डिगा नहीं पाईं।

आगे की परंपरा और प्रक्रियाओं के तहत यह ऐतिहासिक मेला और जलविहार हर साल की तरह अपनी तय धार्मिक मान्यताओं के साथ संपन्न हुआ है। स्थानीय लोगों और आने वाले श्रद्धालुओं को इस प्राचीन संस्कृति को सहेजने तथा अगले साल के आयोजनों में इसी प्रकार भाग लेने के लिए अपनी इस अनूठी विरासत को आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिलती है।

संपादक: प्रकाश सक्सेना • बुंदेलखंड खबर